अन्धकार और प्रकाश का सच जानियें क्या है ?

* **प्रकाश का अतीत है अंधकार *** संम्पादक शिवाकान्त पाठक हरिव्दार उ. ख✍✍ **कलम की ताकत समाचार सेवा**✍✍  हमारे जन्म से पहले अंधकार था मां के गर्भ में भी अंधकार था हम प्रकाश की खोज में रहे हमारे अंदर प्रकाश की लालसा थी लेकिन प्रयास करना हमारे हाथ में नहीं था सब कुछ अपने आप हो रहा था हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते थे जन्म लेने के बाद जब हम दुनिया में आए तब हमारे अंदर अज्ञान रूपी अंधकार था साथ ही हर सुबह के पीछे अंधकार और हर सुबह के परिणाम के बाद अंधकार सभी जगह अंधकार ही था!
प्रकृति ने दिन व रात का प्रावधान दिया| किंतु मानव मस्तिष्क ने पहले अग्नि को खोजा, फिर नन्हें मिट्टी के दीये बना कर गहरी, काली अंधियारी रातों को भी उजाला कर लिया|
ठीक इसी तरह गुरु भी अपने शिष्यों के जीवन में अपने ज्ञान, करुणा व प्रेम के नन्हें-नन्हें दीयों को बड़े धैर्यपूर्वक जगा कर उनके जीवन को प्रकाश वान करता है| ज्ञान, ध्यान व स्नेह के दीयों की दीपावली नित्य ही सदशिष्यों के जीवन को सौंदर्यवान बनाती है, जो बाहरी दीयों की ख़त्म हो जाने वाली रोशनी की जगह चिर- स्थाई अंतर्जगत की दीपावली में हमारा प्रवेश कराती है| साधक के लिए ये बाहरी दीये संदेश हैं, भीतर की दीपावली की ओर अग्रसर होने का|
अंधकार से हमें प्रकाश की ओर अग्रसर होना है| परमात्मा प्रकाश स्वरूप है| लेकिन इस प्रकाश को प्रस्फुटित होने के लिए एक द्वार तो चाहिए| जैसे बल्ब, ट्यूब ये सब किसके कारण जल रहे हैं? जो पीछे से विद्‌युत आ रही है, ये उसकी वजह से जलते हैं| अब जैसे पीछे से विद्‌युत आ रहा हो , और बल्ब न हो तो रोशनी कैसे होगी? बिजली को रोशनी में बदलने के लिए एक माध्यम तो चाहिए, चाहे वह बल्ब हो, या ट्यूब हो, कुछ हो| बिजली कहाँ से बाहर निकले? आगे कोई उपकरण तो हो|

अब मान लो बल्ब फ़्यूज़ हो, पीछे से लाईट आ रही है, तो भी कमरे में अंधेरा ही होगा| तो रोशनी  लाने के लिए बल्ब को बदलना ही पड़ेगा| इसी तरह से ज्ञान रूप परमात्मा है लेकिन इस ज्ञान रूप परमात्मा को भी अपना ज्ञान रूप प्रकाश देने के लिए, यह शरीर रूपी गुरु की आवश्यकता है|
 यह जो मनुष्य का शरीर है, इस शरीर रूपी बल्ब की आवशयक्ता होती है| ज्ञान बिजली की तरह हो गया| परमात्मा निर्गुण है, निराकार है, सत्यस्वरूप है, आनंद स्वरूप है, व्यापक  भी है, चेतना भी है, लेकिन हमको इसका प्रकाश कब मिलता है? जब गुरु रूप बल्ब बीच में आ जाए|
जो लोग यह कहते हैं कि हमें व्यक्ति रूप गुरु की ज़रूरत नहीं है, वे बहुत बड़ी भूल में हैं| बहुत से ऐसे लोग है जो कहते हैं कि हम व्यक्ति रूप गुरु के पास क्यों जाएँ, जब कि हमारे पास गीता है, गुरुबाणी है, उपनिषद् है, हमारे पास सारे ग्रंथ हैं, हम इनको पढ़ कर ज्ञान पा लेंगे| हम किसी संत के पास क्यों जाएँ? तो याद रहे, आपके पास बल्ब की फोटोग्राफ हो सकती है, बड़ी सुंदर फोटो हो, तुम उन सब को घर में लाकर चिपका दो, तो क्या रोशनी हो जाएगी?
परमात्मा ज्ञान रूप है, यह सच बात है| लेकिन इस ज्ञान रूप बिजली का प्रकाश अगर देखना है तो गुरु का वह बल्ब बीच में तुम्हें चाहिए ही चाहिए, इसके बगैर रोशनी  नहीं होगी| सिर्फ़ बिजली से प्रकाश नहीं होता है, प्रकाश तो बल्ब से होता है, इसीलिए कहा-
राम त जूं, पै गुरु न बिसा रूँ
गुरु के सम हरी को न निहा रूँ
अगर दोनो में से एक को चुनना ही पड़ जाए तो मैं गुरु को चुनूँगा  क्योंकि गुरु के द्वारा ईश्वर को समझ लूँगा| अगर गुरु न रहा पास में, तो ईश्वर तो गूंगा है, वह बोल नहीं सकता है| सत्य तो गूंगा है, सत्य को ज़ुबान तो गुरु ही देता है| कैसे?
राग बाँसुरी के भीतर होते हैं क्या? राग बाँसुरी के अंदर नहीं, राग बजाने वाले के  कंठ में होते हैं| बाँसुरी चुरा लेने से तुम उसके राग नहीं चुरा सकते| इसी तरह से ज्ञान, देने वाले  उस व्यक्ति के हृदय में है, ज्ञान शब्दों में नहीं होता| शब्द तो सिर्फ़ बाहरी माध्यम हैं| जैसे बाँसुरी सिर्फ़ माध्यम है|
 सारे ग्रंथ, सारे शब्द, उस बाँसुरी की तरह से हैं| पुस्तकों में लिखे शब्द उस बाँसुरी की तरह ही हैं| तुमने दो टके में  ज्ञान  की किताब तो खरीद ली, पर इस भ्रम में मत रहना कि उसमें से ज्ञान का राग भी निकलने लग जाएगा| ज्ञान का राग तो गुरु के मुखारविन्द से ही निकले तो असर करता है|
तुम सबके लिए मैं हृदय से मंगल कामना करती हूँ | तुम्हारा अंधकार दूर हो, तुम्हारा तमस दूर हो, तुम्हारा साधना का मार्ग प्रशस्त हो, तुम्हारे संकल्प बलवती हों, और तुम बंधनों से मुक्त हो जीवन के अमृत लाभ को ले सको| यह रोशनी जो अभी बाहर है, यह तो कल तक नहीं थी, आज है और फिर ख़त्म हो जाएगी| सुबह में भुवन भास्कर सूर्य देवता जब उदय होंगे तो इनकी रोशनी की चमक क्या रह जाएगी सूर्य के सामने! यह अभी इतनी प्यारी जो लग रही हैं रोशनियाँ; छोटी-छोटी टिमटिमाती पीली लाल नीली;  सूरज के सामने फीकी हो जाएँगी|

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