आखिर अब क्यों नहीं होते देंगे वह आतंकवादी हमले आइए जानते हैं क्यों ?

आखिर अब क्यों नहीं हो रहे दंगे आइये  जानते हैं रहस्य!  शिवाकान्त पाठक संम्पादक हरिव्दार!  क्योंकि अब मोदी सरकार  मोदी ने वह सब कर दिखाया जो आज तक की  सरकारों ने ना तो किया ना करने का दमखम रखा !  मोदी जी द्वारा  लिए गए हरफैसले  से  आज सिर्फ भारत  नहीं पूरा विश्व जान चुका है के मोदी  जी वास्तव में एक नई ताकत नये साहस  के रूप में भारत के लिए उभर कर सामने आये हैं !आपको बताते चलें कि 2013 और 2014 अक्तूबर तक, केवल उत्तरप्रदेश में 102 लोग सांप्रदायिक दंगों में मारे गए हैं. पिछले छह महीने में हुए कई लोकसभा और राज्यसभा सत्रों में सांप्रदायिक दंगों का मुद्दा हावी रहा.
क्या कहते हैं आंकड़ें?
त्रिलोकपुरी हिंसा
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) मुताबिक 2013 में भारत में 72,126 दंगे दर्ज हुए थे. एनसीआरबी के मुताबिक भारत में साल 2000 से 2013 के बीच हर साल औसतन 64,822 दंगे हुए हैं.
हालांकि इन आंकड़ों में सभी तरह के दंगे शामिल हैं, जहां गैरकानूनी तरीके से भीड़ ने जबरन बल इस्तेमाल किया हो.
लेकिन अगर सांप्रदायिक दंगों की बात की जाय, तो इस साल अक्तूबर तक हर महीने भारत में 56 दंगे हुए हैं जिसमें 90 लोग मारे गए हैं और 1688 घायल हुए हैं. पिछले साल इस समय तक 133 लोग सांप्रदायिक दंगों में मारे गए थे.
संसद में दंगों को लेकर हुई बहस में गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने बताया कि ज़्यादातर सांप्रदायिक दंगे सोशल मीडिया पर आपत्ति जनक पोस्ट, लिंग संबंधी विवादों और धार्मिक स्थान को लेकर हुए हैं.
'दंगे हमेशा करवाए जाते हैं'
त्रिलोकपुरी हिंसा
भारत में दंगों और उसके कारणों को लेकर बहुत कम शोध हुए हैं. जानकर मानते हैं कि इसका बहुत बड़ा कारण सही आंकड़ें न मिल पाना और सांप्रदायिक दंगों के केस का कोर्ट में लंबे समय तक चलना है.
पूर्व आईएएस अफ़सर और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर मानते हैं दंगे कभी अपने आप नहीं होते.
उनका कहना है, "मैं सामाजिक हिंसा का अध्ययन पिछले कई सालों से कर रहा हूँ और यह बात पक्के तौर से कह सकता हूँ कि दंगे होते नहीं पर करवाए जाते हैं. मैंने बतौर आईएएस कई दंगे देखे हैं. अगर दंगा कुछ घंटों से ज़्यादा चले तो मान लें कि वह प्रशासन की सहमति से चल रहा है."
मंदर इन दिनों भारत में पिछले कुछ दशक में हुए दंगों पर शोध कर रहे हैं और कहते हैं कि दिल्ली में पिछले दिनों जो हुआ, उससे यह स्पष्ट है कि राजनीतिक संगंठनों के लिए किसी को भी लड़वाना आसान है.
त्रिलोकपुरी हिंसा
वह कहते हैं की दिल्ली में 1984 से 30 सालों के बाद तक कभी त्रिलोकपुरी जैसी घटना नहीं हुई तो फिर अचानक क्यों?
हर्ष मंदर का कहना है, "दंगे करवाने के लिए तीन चीज़ें बहुत जरूरी है. नफ़रत पैदा करना, बिल्कुल वैसे जैसे किसी फैक्टरी में कोई वस्तु बनती हो. दूसरा, दंगों में हथियार, जिसका भी प्रयोजन होता है."
उन्होंने बताया, "अगर बड़े दंगे करवाने हैं तो छुरी और सिलिंडर बांटे जाते हैं और सिर्फ एक तनाव का वातावरण खड़ा करना हो तो ईंट-पत्थर. तीसरा है, पुलिस और प्रशासन का सहयोग जिनके बिना कुछ भी मुमकिन नहीं."
खाकी का रंग
त्रिलोकपुरी हिंसा
जाने-माने पूर्व आईपीएस अफ़सर जुलियो रिबेरो और विभूति नारायण राय ने दंगों में पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं.
पूर्व आईपीएस अफ़सर सुरेश खोपड़े दंगे रोकने के लिए महाराष्ट्र के भिवंडी में किए गए प्रयोग के लिए जाने जाते है उन्होंने एक किताब 'मुंबई जल रहा था पर भिवंडी क्यों नहीं' भी लिखी है.
सुरेश खोपड़े कहते हैं, "भारत में पुलिस बल में सिर्फ चार फ़ीसदी मुसलमान हैं और बाक़ी के 96 फ़ीसदी में कई लोग सांप्रदायिक सोच वाले होते हैं लेकिन दंगे न रुक पाने के कारण कुछ और हैं."
उन्होंने कहा, "इतने दंगों के बावजूद किसी भी सरकार ने पुलिस बल को ऐसे मामले रोकने के लिए सशक्त नहीं किया. भिवंडी में दंगे आम बात हो गई थी. जब मेरी वहां पोस्टिंग हुई तो मैंने मोहल्ला कमेटी बनाई और पुलिस कॉन्स्टेबल को उनका अध्यक्ष रखा !

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